इंडिया ऑटिज्म सेंटर (IAC) हाल ही में कोलकाता में 'ऑटिज्म इन प्रैक्टिस' नाम सूं एक खास कार्यक्रम रो आयोजन करयो। ओ आयोजन 'वर्ल्ड ऑटिज्म अवेयरनेस मंथ' रे मौके माथे माता-पिता ने जागरूक करण और ऑटिज्म सूं जूझ रह्या टाबरां री देखभाल वास्ते सही जानकारी देवण रे मकसद सूं राख्यो गयो हो।

मुख्य समाचार रो सार:

  • इंडिया ऑटिज्म सेंटर और सोसायटी ऑफ पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी बंगाल रे मिलाप सूं ओ कार्यक्रम होयो।

  • ईं में माहिर डॉक्टरां और थेरेपिस्टां ऑटिज्म पीडितों री आखी उमर देखभाल और 'समावेश' (Samaavesh) प्रोजेक्ट माथे चर्चा करी।

  • माता-पिता ने टाबरां रे खान-पान, व्यवहार और थेरेपी सूं जुड्या जरूरी नुस्खा बताया गया।

ऑटिज्म री देखभाल वास्ते 'समावेश' रो विजन

इंडिया ऑटिज्म सेंटर रा डायरेक्टर और CEO जयशंकर नटराजन ईं मौके माथे 'समावेश' प्रोजेक्ट रे बारे में बताया। ओ भारत रो सबसूं बड़ो रिहायशी इकोसिस्टम बणन वालो है, जठे ऑटिज्म सूं जुड्या मिनखां ने आखी उमर सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल मिल सकेलो। नटराजन कह्यो कि सिर्फ शुरुआती इलाज ही काफी कोनी, बल्कि जब ओ टाबर मोटा हो जावे, जणा उणरी देखभाल कियां होवे, ईं माथे काम करणो घणो जरूरी है।

माहिर डॉक्टरां दी खास सलाह

ईं कार्यक्रम में डॉक्टर सुदीप साहा, डॉक्टर अरिजीत चट्टोपाध्याय और डॉक्टर जशोधरा चौधरी समेत कई मोटा डॉक्टरां हिस्सा लियो। डॉक्टर मनीष समनानी, जो कि 'सोच' (SOCH) रा डायरेक्टर है, उणां 'ऑक्युपेशनल थेरेपी' माथे जोर दियो। उणां बताया कि कियां छोटा-मोटा काम सीखार टाबरां ने आत्मनिर्भर बणायो जा सके है। डॉक्टर रुद्रजीत सिन्हा 'दवाइयां और उणसूं आगे' विषय माथे चर्चा करी और बतायो कि मेडिकल इलाज रे साथे-साथे व्यवहार में बदलाव लावण री थेरेपी भी घणी जरूरी है।

खान-पान और व्यवहार माथे चर्चा

टाबरां रे पोषण ने लेर प्रोफेसर डॉक्टर कल्पना दत्ता खास जानकारी दी। उणां बताया कि ऑटिज्म पीडित टाबरां में खाण-पीण री कई चुनौतियां होवे है, जिणने सही डाइट सूं सुधारी जा सके है। कार्यक्रम रे दूजे भाग में रंजना चक्रवर्ती किशोर अवस्था (Teens) में आवण वाला टाबरां रे व्यवहार और उणां री भावनावां ने समझण रा तरीका सिखाया। माता-पिता वास्ते राख्यो गयो 'फायरसाइड चैट' सैब सूं खास रह्यो, जिणमें नीलंजन रामबोथु और सुमित्रा पॉल बख्शी आपणी निजी यात्रा और अनुभवा साझा करया।

समाज में जागरूकता री जरूरत

डॉक्टर रुद्रजीत सिन्हा, जो खुद एक ऑटिस्टिक टाबर रा पिता है, उणां कह्यो कि ऑटिज्म री जागरूकता सिर्फ एक महीने ताईं सीमित नहीं रहणी चाहीजे। ओ तो हर दिन री समझदारी रो विषय है। जेकर टाबर ने सही बखत माथे इलाज और समाज रो साथ मिले, तो वे भी एक आम मिनख री ज्यूं सुखी जीवन जी सके है।